Pitra Paksha 2026:बद्रीनाथ धाम से 200 मीटर दूर अलकनंदा के किनारे है ये मोक्ष तीर्थ, यहाँ पिंडदान करने से पितरों को मिलता है 8 गुना ज़्यादा पुण्य। पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत 27 सितंबर, रविवार से हो रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर होगा। इस दौरन देश भर में पिंडदान और तर्पण के लिए गया और काशी में भीड़ उमड़ती है, लेकिन उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ का महत्व सबसे अलग मन जाता है। कहा जाता है कि यहां पिंडदान अंतिम होता है और इसके बाद उस पितृ के लिए दोबारा पिंडदान की जरूरत नहीं पड़ती।
क्या है ब्रह्मकपाल की पौराणिक कथा?
पौराणिक कथा के अनुरूप, एक बार अहंकार में आकर ब्रह्मा जी ने स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताना शुरू कर दिया। उनके इस अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान शिव ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से ब्रह्मा जी का 5वा सिर काट दिया।
लेकिन इसके बाद ब्रह्मा जी का काटा हुआ सर भगवान शिव के त्रिशूल पर ही चिपक गया और शिव जी पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया। इस पाप से मुक्ति के लिए महादेव तीन लोकों में भटकते रहे, भिक्षाटन किया, लेकिन कहीं मुक्ति नहीं मिली।
जब वे भ्रमण करते हुए बद्रीनाथ क्षेत्र में अलकनंदा नदी के तट पर पहुंचे, तो अचानक ब्रह्मा जी के कपाल त्रिशूल से अलग होकर जमीन पर गिर गया। इसी स्थान को ब्रह्मकपाल और कपाल मोचन तीर्थ कहा गया। याही भगवान शिव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी।
पितृ पक्ष में क्यों है विशेष महत्व?
मान्या है कि पांडवों ने भी महाभारत युद्ध के बाद गोत्र-हत्या के पाप से मुक्ति के लिए यहीं पिंडदान किया था।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और ये अन्य तीर्थों के मुकाबल 8 गुण अधिक फलदायी होती है। इसीलिये बद्रीनाथ को मोक्ष धाम भी कहा जाता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति में भी इसका उल्लेख है – “आयुः प्रजाम धनम् विद्या, स्वर्ग मोक्ष सुखनि च, प्रयच्छन्ति तथा राज्यम्, पितरः श्राद्ध तर्पितः” अर्थ श्राद्ध से तृप्त होकर पितृ अपने वंश को आयु, संतान, धन और मोक्ष प्रदान करते हैं।
इस साल ख़राब मौसम के बावज़ूद ब्रह्मकपाल में हजारों श्रद्धालू पाहुंच रहे हैं। मंदिर के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को होगा और 27 सितंबर को पितृ पक्ष के मुख्य कार्य शुरू होंगे।

