Jhalkari Bai Jayanti:November 2025: रानी लक्ष्मी बाई से उम्र में मात्र 2 वर्ष 2 दिन छोटी झांसी के भोजला गाँव में पिता सुदोवर सिंह और माता जमुना देवी के घर 22 नवम्बर 1830 में जन्मी झलकारी बाई एक निर्धन परिवार से ताल्लुक रखती थी। बचपन में ही माता की मृत्यु हो जाने के कारण उनके पिता ने उनकों बेटों की तरह पाला पोश कर घुड़सवारी करने और तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया। जिसके कारण वह एक बहादुर और निडर महिला के रुप में पूरे गाँव में चर्चित हो गयी थी।
झलकारी बाई ने बाघ और डाकुओं से बचायी थी, लोगों की जानः
झलकारी बाई ने अपने गाँव के लोगों को बाघ और डाकुओं से बचाया था । उनकी इस वीरता और साहस को देखते हुये उनका विवाह रानी लक्ष्मीबाई के साहसी सैनिक पूरन से करवा दिया गया। जब एक दिन झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई से मिलने के लिये किले में प्रवेश किया तब रानी लक्ष्मी बाई उनके अपने जैसे रुप रंग को देखकर यकीन नही कर सकी कि झलकारी बाई की शक्ल हुबहु बिल्कुल उनसे मिलती है।

रानी ने गाँव वालो से उनकी बहादुरी के किस्से सुन रखे थे। जिससे वह बहुत प्रभावित थी उन्होंने अपनी ब्रिटिश सेना से युद्ध के लिये तैयार की जा रही दुर्गा सेना में झलकारी बाई को शामिल करके सेना का प्रमुख सेनापति बना दिया।
रानी की हमशक्ल होने से शत्रु को चकमा देने में रहती थी, सफलः
1857 के विद्रोह में जब अग्रेंजों की सेना ने झांसी पर हमला किया तब झलकारी बाई ने रानी के वस्त्र, पगड़ी और कलगी मांग कर पहन ली और अग्रेंजों से युद्ध करने के लिये निकल पड़ी तभी अग्रेंजों ने उन्हें रानी लक्ष्मी बाई समझ कर घेर लिया और पूरे शहर में ऐलान करवा दिया कि रानी लक्ष्मी बाई पकड़ी जा चुकी है। अग्रेंजी सेना यह सूचना सुनकर खुशी से पागल हो उठी और उन्होंने पहरा देना छोड़ दिया जिसके बाद रानी झांसी से ग्वालियर भागने में सफल हो सकी।
लेकिन जब अग्रेंज सैनिकों को सच्चाई का पता चला कि वह रानी लक्ष्मीबाई नहीं उनकी हमशक्ल सेनापति प्रमुख झलकारी बाई है तब अग्रेंजी सैनिक गुस्से से तिलमिला गये और झलकारी बाई को फांसी पर चढ़ा दिया। मात्र 28 वर्ष की आयु में एक महान वीरांगना झलकारी बाई ने झांसी और रानी लक्ष्मी बाई जी के प्राणों की रक्षा करते हुये अपने प्राणों का बलिदान कर दिया और वीरगति को प्राप्त हो गई।
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