Folk Culture: थूथुकुडी में तमिलनाडु की पारंपरिक कला, संगीत, खान-पान और तटीय जीवन को करीब से दिखाने वाला पांचवां नेयथल आर्ट्स एंड फूड फेस्टिवल रविवार रात संपन्न हो गया। थूथुकुडी के वी.ओ.सी. ग्राउंड में 14 से 16 अगस्त तक चले इस तीन दिवसीय आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।
महोत्सव में तमिलनाडु के अलग-अलग इलाकों से आए 300 से ज्यादा लोक कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य, संगीत और लोक कलाओं की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम हर दिन शाम 5 बजे से रात 10 बजे तक चला।
कला के साथ पारंपरिक भोजन भी रहा आकर्षण
नेयथल महोत्सव में केवल लोक नृत्य और संगीत ही नहीं, बल्कि तमिलनाडु के पारंपरिक तटीय भोजन को भी खास जगह दी गई। आयोजन स्थल पर 30 से ज्यादा फूड स्टॉल लगाए गए, जहां लोगों ने अलग-अलग स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लिया।
इसके अलावा ग्रामीण महिला कारीगरों ने अपने हाथों से तैयार किए गए हस्तशिल्प की प्रदर्शनी लगाई। इससे लोगों को ग्रामीण कला और स्थानीय हुनर को करीब से देखने का मौका मिला।
समुद्र और तटीय जीवन से जुड़ा है नेयथल
‘नेयथल’ नाम तमिल के प्राचीन संगम साहित्य से लिया गया है। इसमें समुद्र और समुद्र से जुड़े तटीय इलाकों का वर्णन मिलता है।
इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी लंबे समय से समुद्र, मछली पकड़ने, नावों, स्थानीय भोजन और पारंपरिक कलाओं से जुड़ी रही है। इसी विरासत को लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से नेयथल महोत्सव आयोजित किया जाता है।
कई पारंपरिक कलाओं ने बांधा समां
14 अगस्त को गणेश्का सिलंबम थूथुकुडी की प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इसके बाद देवराट्टम, ओयिलाट्टम, थप्पाट्टम, पोइक्कल कुथिरई और कनियान कूथु जैसी पारंपरिक कलाओं की प्रस्तुति हुई।
लोक संगीत के साथ आधुनिक संगीत का मेल भी देखने को मिला। संगीत कलाकार काबेर वासुकी की प्रस्तुति ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा।
पद्मश्री से सम्मानित परई कलाकार वेलु आसन भी इस आयोजन का हिस्सा बने। वह नेयथल के हर संस्करण में प्रस्तुति देते रहे हैं। उनके जरिए परई वादन जैसी पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश की गई।
लोक कला में छिपी है समाज की कहानी
महोत्सव में लोक कलाओं को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की पुरानी यादों और जीवनशैली को सामने रखने वाला माध्यम बताया गया।
सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने कार्यक्रम में लोक कलाओं को आम लोगों से जुड़ी कला बताया। उन्होंने कहा कि लोकगीतों में कई बार स्थानीय खान-पान, पेड़-पौधों, काम-धंधे, नाव और मछली पकड़ने जैसे विषयों की झलक मिलती है।
इस लिहाज से लोकगीत और लोक नृत्य केवल मंच की प्रस्तुति नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए पुरानी पीढ़ियों की संस्कृति और जीवन के बारे में भी जानकारी मिलती है।
ग्रामीण कलाकारों को मिला बड़ा मंच
बदलते समय और आधुनिक मनोरंजन के कारण कई पारंपरिक कलाओं के सामने अपनी पहचान बनाए रखने की चुनौती है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कलाकारों को बड़े मंच और दर्शकों तक पहुंचने के कम अवसर मिलते हैं।
नेयथल जैसे आयोजन इन कलाकारों को अपनी कला दिखाने का मौका देते हैं। इससे युवाओं को भी अपनी क्षेत्रीय और पारंपरिक संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।
सरकार बदली, लेकिन आयोजन जारी रहा
नेयथल के पहले चार आयोजन 2022 से 2025 के बीच हुए थे। इस दौरान तमिलनाडु में डीएमके की सरकार थी। 2026 में राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बावजूद महोत्सव का आयोजन जारी रहा।
आयोजकों का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक बदलाव से अलग लोक कलाकारों और पारंपरिक संस्कृति के लिए मंच उपलब्ध कराना रहा। इस आयोजन के जरिए कलाकारों को नई पीढ़ी और बड़े दर्शक वर्ग से जोड़ने की कोशिश की गई।
परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने की पहल
तीन दिनों तक चले नेयथल महोत्सव में कला, संगीत, भोजन और हस्तशिल्प के जरिए तमिलनाडु की ग्रामीण और तटीय संस्कृति को एक ही मंच पर प्रस्तुत किया गया।

आयोजन ने यह दिखाने की कोशिश की कि लोक संस्कृति केवल पुरानी यादों का हिस्सा नहीं है, बल्कि आज भी लोगों के जीवन से जुड़ी हुई है। ऐसे मंच पारंपरिक कलाकारों को पहचान देने के साथ उनकी कला को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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