Hindu Philosophy: कोई भी युग आ गया हो या कोई भी जनरेशन लेकिन अपने पिछले जन्म में क्या थे ये जानना हर किसी के लिए आज भी उतना ही दिलचस्प हो जितना की चांद पर पहुंचना, क्योंकि ये हवा, धरती और समय तब भी उसी गतिमान से चल रहे थे जब आपका शरीर और नाम यहा मौजूद नही था।
अब ये जनना बेहद रोचक हो जाएगा कि क्या आप उस वक्त विद्यमान थे जब ये धरा थी, या फिर उस वक्त की सभी मैमोरी आप भूल चुके है। ये कोई आम बात नहीं है। ये बहुत खास बात है। और ये प्रश्न लाखों वर्षों से मौजूद है। जिसे बड़े-बड़े ऋषियों, मुनियों को बेचैन किया है।
बता दें कि ये इतना असाधारण प्रश्न है कि नचिकेता को यमराज के सामने खड़े होने पर मजबूर कर दिया था। ये वो प्रश्न है जिसका उत्तर खोजते-खोजते उपनिषदों का जन्म हुआ और इसका उत्तर स्वयं आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत में दिया है।
जन्म के बाद के कुछ साल क्या याद है आपको?
लेकिन सबसे खास बात ये है कि ये आपके पिछले जन्म की पहचान आपको अदंर तक हिला सकती है। क्योंकि जिस व्यक्ति को आप जीवन भर से समझ रहे थे, वास्तव में आप हैं ही नहीं है। इसका सबसे सरल जवाब यहीं निकल कर आता है कि क्या आपको अपना बचपन याद है उस वक्त बिताए कुछ लम्हे याद होगें और कुछ पुरानी घटनाएं याद है लेकिन क्या आपको अपना जन्म याद है? क्या आपको वो वक्त याद है जब आपने अपनी आंखें खोली थी और इन सभी सवालों और जवाबों के बीच क्या आपको ये याद है कि जन्म से पहले आप कहां थे। बिल्कुल नहीं और अगर आप रात में सो जाएं तो कई बार सुबह उठने के बाद आपको रात के कुछ घंटें याद नहीं रह जाते।
हर परिवर्तन के बीच अपरिवर्रितत बना रहता है?
इसका अर्थ ये बिल्कुल नहीं है कि उन कुछ घंटों में आपका अस्तिव समाप्त हो गया था, आप मौजूद थे लेकिन कुछ याद ना हो वो अलग की बात है। यहा से शुरू होता है वेदांत को समझाना, क्योंकि स्मृति और अस्तिव एक ही चीज नहीं है। किसी भी बात का याद न रहा अस्तिव को नहीं नकार सकता। बस यही से जन्म से पहले के रहस्य का द्वार खुलना शुरू होता है। हम सभी यह मानकर जीते है कि हमारा अस्तिव जन्म के दिन शुरू हुआ। ये वो शरीर नहीं है दो जन्म के समय था क्योंकि विज्ञान कहता है कि शरीर की अधिंकाश कोशिकाएं बदल जाती है। फिर भी मन में ये बात क्यों आती है कि मैं वहीं हूं जो बचपन में था और युवावस्था में था। शरीर बदला ऊम्र बदली फिर भी भावनाएं बदल गई तो फिर वो कौन है जो बचपन को भी अपना कहता है और वर्तमान को भी कौन है जो हर परिवर्तन के बीच अपरिवर्रितत बना रहता है?
वो क्या है जो शरीर के बदलने पर क्या नहीं बदलता
वहीं प्रश्न है जहां से अध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है और यही वह प्रश्न है जो हमें जन्म से पहले के अस्तिव के रहस्य तक ले जाता है। क्योंकि यदि हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो शरीर के बदलने पर भी नहीं बदलता तो क्या यह संभव नहीं कि वह जन्म से पहले भी मौजूद रहा हो और यदि वह जन्म से पहले था तो आखिर वह था कहां यही वह रहस्य हैजिसे समझे बिना नातो जीवन को समझा जा सकता है और ना मृत्यु को लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अधिकांश लोग कभी यह प्रश्न पूछते ही नहीं। वे सिर्फ पूरा जीवन धन कामने और इच्छाएं पूरी करने में ही लगे रहते है।
शरीर बदलता है आदतें नहीं
ये जनना भी जायज नहीं समझते जिस भी व्यक्ति के लिए वो ये सब कर रहे है वो आखिरकार है कौन यही कारण है कि वेदांत सबसे पहले बाहरी संसार के लिए नहीं बल्कि खुद की खोज करने को कहता है। स्वयं की खोज करने को कहता है। क्योंकि यदि खोजने वाला ही अज्ञात है तो उसकी सारी खोज अधूरी है। तो अब प्रश्न यह है क्या जिसका उत्तर खोजते खोजते वेदांत के सबसे महान सत्य तक पहुंचे।
लेकिन इस उत्तर को समझने के लिए हमें सबसे पहले बड़ी भूल को पहचानना होगा और ये भूल हर कोई करता है। वह ये समझता है कि मैं एक स्त्री हूं, मैं पुरुष हो मैं बच्चा हूं मैं बूढ़ा हूं। क्योंकि हम जन्म से ही खुद को मैं कहते है, ऐसे में शरीर बदलता है आदते बदलती है, परिस्थिती बदलती है। लेकिन शुरू से मैं कहते थे और आज भी मैं कहते है।
वहीं आदि शंकराचार्य कहते है कि जब तक मनुष्य इस प्रश्न का उत्तर नहीं खोजता तब तक इस जन्म और मृत्यु के रहस्य को नहीं समझ सकता क्योंकि जिस चीज का जन्म है उसकी मृत्यु भी निश्चित है। और अगर इसके विपरीत देखा जाए तो जिसका जन्म ही नहीं हुआ है उसकी मृत्यु कैसे हो सकती है।
वेदांत कहता है?
अगर शरीर प्रकट हुआ और आत्मा समुद्र की तरह उस शरीर में समा जाती है वही जब शरीर का अंत हुआ तो आत्मा समुद्र की तरह नया रूप धारण कर लेती है। क्योंकि आत्मा न जन्म लेती है न ही मरती है शरीरों के माध्यम से स्वयं को प्रकट करती है लेकिन यहां एक कठिन प्रश्न फिर से खड़ा हो जाता है कि सारी समृतियां कहा गई? इस बात को कई लोग पुनर्जन्म का प्रमाण मानते है।
फिलहाल पुनर्जन्म को छोड़िए क्या आपको अपने जन्म के बाद 5-6 वर्ष याद है.. तो इसका जवाब होगा नहीं.. लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि उस क्षण कुछ घटित नहीं हुआ होगा । शंकराचार्य कहते है कि स्मृतियां मन से जुड़ी होती है। आत्मा से नहीं। जब शरीर बदलता है तो मन और स्मृतियां भी बदल जाती है। भगवत गीता में भी कहा गया है कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्र धारण करता है वैसे ही आत्मा भी नए शरीर के लिए पुराने शरीर को त्याग देती है। जिसके साथ ही स्मृतियां भी पीछें रह जाती है।
वेदांत किसे कहता है मुक्ति
यानी की आत्मा किसी विशेष स्थान पर थी। लेकिन अद्वैत कहता है कि आत्मा स्थान और समय दोनों से परे है ये बार फिर से सोचिए कि जब आप किसा स्वप्न का पूरा संसार आपके भीतर ही उत्पन्न होता है। जैसे कि पहाड़ है, नदियां हैं, लोग है कई ऐसी घटनाए है जो कभी हुई तो कभी जीवन में घटित ही नहीं हुई है। जिससे शाश्वत चेतना की अभिव्यक्ति हो जो ना कभी जन्मी थी ना कभी मरेगी। बस यही वो सत्य है जो केवल तुम्हारा शब्द न बन कर तुम्हारा अनुभव बन जएगा उसी दिन जन्म और मृत्यु दोनों के रहस्य हो जाएंगे।
उसी दिन सब कुछ समझ आएगा कि तुम इस संसार में आए नहीं थे। बल्कि किसी शरीर में स्वयं को अनुभव कर रहे थे। और वही ये ज्ञान है जिसे वेदांत मुक्ति कहता है। यही वह सत्य है जिसकी खोज में ऋषि जीवन भर तप करते है और शायद यही वह उत्तर है जिसकी तलाश में तुम इश वीडियो तक पहुंचे हो।
ये भी पढ़ें- God is not outside: भगवान बाहर नहीं, आपके अंदर हैं

