Garud Puran: हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को 16 संस्कारों में से आखिरी संस्कार माना गया है। अक्सर देखा जाता है कि पिता की मृत्यु पर बेटा ही चिता को मुखाग्नि देता है, बेटी नहीं। आखिर इसके पीछे गरुड़ पुराण और धर्मशास्त्रों में क्या कारण बताया गया है? आइए जानते हैं।
क्या कहता है गरुड़ पुराण
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा की सद्गति और मोक्ष के लिए पिंडदान और मुखाग्नि का बहुत महत्व है। पुराण में कहा गया है कि अग्नि देना केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि पिता के प्रति पुत्र के ऋण को चुकाने की प्रक्रिया है।
शास्त्रों के अनुसार, बेटा पिता के वंश को आगे बढ़ाता है, इसलिए उस पर पितृ ऋण होता है। मुखाग्नि देकर वह इस ऋण से मुक्त होता है और पिता की आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाता है।
बेटी को मुखाग्नि न देने के 4 बड़े कारण
गोत्र और वंश परंपरा का नियम:
हिंदू धर्म में शादी के बाद बेटी का गोत्र बदल जाता है। वह अपने पति के गोत्र में चली जाती है, जबकि बेटा जीवनभर पिता के गोत्र में ही रहता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, एक ही गोत्र का व्यक्ति ही पिंडदान और मुखाग्नि का अधिकारी होता है।
पिंडदान का अधिकार:
मुखाग्नि के बाद 13 दिनों तक पिंडदान करना होता है। यह अधिकार पुत्र, पौत्र या सगे भाई-भतीजे को ही दिया गया है। बेटी पर ससुराल के पितरों का भार होता है, इसलिए वह मायके के पितरों का पिंडदान नहीं कर सकती।
भावनात्मक और शारीरिक कारण:
शास्त्रों में कहा गया है कि अंतिम संस्कार वैराग्य का समय है। बेटी का हृदय बहुत कोमल होता है और पिता के प्रति उसका मोह अधिक होता है। मोह में बंधकर रोने से आत्मा को कष्ट होता है और उसकी मुक्ति में बाधा आती है। इसलिए इस कठिन कार्य से बेटी को दूर रखा गया।
अग्नि और ब्रह्मचर्य का संबंध:
चिता को अग्नि देने के बाद 13 दिन तक कई कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है – जमीन पर सोना, ब्रह्मचर्य का पालन, एक समय भोजन। विवाहित बेटी के लिए इन नियमों का पालन करना कठिन माना गया है।
क्या बेटी कभी अग्नि दे सकती है?
धर्मशास्त्रों में अपवाद भी बताया गया है। अगर किसी व्यक्ति का कोई पुत्र, भाई, पौत्र या सगा पुरुष रिश्तेदार न हो, तो ऐसी स्थिति में बेटी या पत्नी भी मुखाग्नि दे सकती है। गरुड़ पुराण में ही कहा गया है कि पुत्र के अभाव में पुत्री भी पिता का पिंडदान कर सकती है, इससे पिता को मोक्ष मिलता है।
आज के समय में कई जगह बेटियां अपने पिता को मुखाग्नि दे रही हैं और कई धर्मगुरु इसे शास्त्र-सम्मत भी मानते हैं, क्योंकि भाव और श्रद्धा सबसे बड़ी है।
निष्कर्ष
गरुड़ पुराण के अनुसार मुखाग्नि न देने का कारण बेटी को कम आंकना नहीं, बल्कि गोत्र, पिंडदान की परंपरा और आत्मा की शांति से जुड़ा है। लेकिन पुत्र न होने पर बेटी को पूरा अधिकार है।
ये भी पढ़ें- Radha Ashtami 2026: ये 5 गलतियां करने से रूठ जाती हैं राधारानी, बरसाना के पंडित ने दी चेतावनी

