Purvanchal Expressway: पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर दुर्घटना के महज़ दो घंटे बाद ही सड़क ऐसी चमकाई गई, मानो वहां कभी कुछ हुआ ही न हो। डामर पर पानी डाला गया, खून के निशान धो दिए गए, मलबा हटाकर दूर फेंक दिया गया…ताकि तस्वीर साफ़ दिखे, सवाल नहीं।
व्यवस्था की फुर्ती देखिए… हादसा रोकने में सुस्ती, लेकिन हादसे के सबूत मिटाने में बिजली-सी तेजी। लगता है हमारी संवेदनाएँ भी अब स्वच्छता अभियान का हिस्सा बन गई हैं…जहाँ दाग दिखें, तुरंत मिटा दो…चाहे वो सड़क पर हों या सिस्टम पर।
लाशें उठ गईं, जाम खुल गया, ट्रैफिक फिर से दौड़ पड़ा। अख़बार में दो कॉलम, सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट, और फिर सब सामान्य। लेकिन उन पाँच ज़िंदगियों का क्या, जिनके घरों में अब सन्नाटा स्थायी मेहमान बन गया? क्या वहाँ भी कोई टीम भेजी जाएगी, जो मातम को पोंछकर दीवारें चमका दे?
सड़क तो चमक गई, पर क्या ज़मीर भी उतनी ही आसानी से पॉलिश हो जाता है? मलबा हट गया, पर क्या लापरवाही भी हट गई? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें हादसों से ज़्यादा उनकी साफ-सफाई की आदत पड़ गई है… क्योंकि सच से सामना करना, खून के धब्बे धोने से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है।
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