Tuesday, March 24, 2026

Watch & Time: घड़ियां वक्त दिखाने के साथ बनाती है, तकदीरः

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Watch & Time: October 2025: साधारण सी वस्तु समझी जाने वाली घड़ी के बिना व्यक्ति का जीवन अधूरा है। हम अपने घर और व्यक्तित्व को कितना भी व्यवस्थित क्यों न कर ले। लेकिन जब तक घर के आगंन एवं कमरों और हाथों की कलाई पर घड़ी न बंधी हो तब तक ऐसा लगता है मानों वक्त थम गया हो मन बेचैन होने लगता है। हमारी निगाहें चारों तरफ समय देखने के लिये विचलित हो उठती है।

आखिर क्यों न हो ? व्यक्ति के संपूर्ण जीवन की दिनचर्या समय पर निर्भर करती है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कुछ है तो वह समय है। क्योंकि समय का सही उपयोग करके धन सम्पदा तो अर्जित कर सकते है लेकिन समस्त धन सम्पदा को खर्च करने के बाद भी बीते हुये समय को वापस नही लाया जा सकता है। दुनियाँ का प्रत्येक व्यक्ति घड़ी द्वारा दिखाये गये समय का सदुपयोग करके अपने घर की तस्वीर और हाथों की लकीर दोनों को बेहतर बना सकता है।

1505 में बनी दुनियाँ की पहली स्प्रिंग से चलने वाली पोमैडर वॉचः 

जब दुनियां में घड़ियों का अस्तित्व नहीं था उस दौरान लोग जमीन पर लगाई गयी छड़ी पर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पड़ने वाली सूर्य की किरणों से प्रदर्शित होने वाली सूर्यघड़ी से दिन के समय की और चाँद तारों द्वारा रात के समय की गणना किया करते थे।

इसके बाद जल की बहती धार से बनी जलघड़ी और कांच के फ्लास्क के अंदर गिरती बालू से विकसित बालूघड़ी से लोगों ने समय का अनुमान लगाने का कार्य प्रारम्भ किया। कुछ समय उपरान्त पशु पक्षियों की बोलने और उनकी चहचहाट से लोग समय का अदांजा लगाना शुरु करने लगे। समय बीता और तकनीकी विकास के साथ पूर्जे और चाबियों से चलने वाली घड़ियों का प्रचलन शुरु हुआ।

अमेरिका में शुरू हुई समय प्रणाली

1505 में दुनियाँ की पहली स्प्रिंग से चलने वाली पोमैडर वॉच घड़ीसाज पीटर हेनलेन द्वारा बनायी गई। 14वीं शताब्दी में पूर्जे से चलने वाली यांत्रिक घड़ियाँ और 16 वीं शताब्दी में कलाई पर बाधंने वाली व्यक्ति को उसके समय की कीमत बाताने के लिये घड़ियाँ अस्तित्व में आयी। 1942 में 24 घंटे का समय ज्ञात कराने वाली समय प्रणाली अमेरिका में शुरु हुई।

भारत में एचएमटी ने 1961 में बनायी कलाई में बाधंने वाली पहली, घड़ीः 

भारत में सर्वप्रथम नई दिल्ली में जलवायु घड़ी स्थापित की गई। तेजी से बदलते समय के साथ भारत का तकनीकी दौर भी अपनी विकास की सीमाओं को पार गया। पहली भारतीय कम्पनी एचएमटी हिन्दूस्तान मशीन टूल्स ने 1961 में कलाई में बाधंने वाली घड़ी बनाई। इसके बाद भारत में दीवार और कलाई में बांधने वाली घड़ियों के क्षेत्र में क्रान्ति आ गई। आज देश में कई प्रसिदॄ कंपनियां उपभोक्ता वर्ग की पसन्द को देखते हुये इलेट्रॉनिक घड़ियों के अलावा यूनिक क्वालिटी की घड़ियाँ उपलब्ध कराने हेतु  प्रतिस्पर्धा की दौड़ में एक दूसरे से आगे निकल रही है।

वास्तु के हिसाब से घर की दीवारों पर लगाये, घड़ीः

वास्तु के हिसाब से घर की दीवारों पर गोल, चौकोर और अष्टकोणीय आकार की घड़ियाँ लगाने से घर में सकरात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने के साथ घर का वातावरण खुशहाल और सामंजस्यपूर्ण बना रहता है। कुबेर का वासस्थान और समृदिॄ को प्रदर्शित करती उत्तर दिशा, नये अवसरों को दर्शाती पूर्व दिशा और प्रगति का आवाहन करती पश्चिम दिशा की दीवारों पर घड़ी लगाना शुभता का प्रतीक माना जाता है। जबकि दक्षिण दिशा की दीवार पर नकरात्मक ऊर्जा के प्रभाव के कारण घड़ी लगाने से बचना चाहिये।

कलाई पर सिल्वर, स्टील और गोल्डन घड़ियाँ करती है, भाग्योदयः

कलाई में बाधंने वाली घड़ियों की बात की जाय तो यह भग्योदय और व्यक्तित्व को प्रदर्शित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिये स्पष्ट दिखाई देने वाले नम्बर के साथ गोल चौकोर एंव अण्डाकार डायल वाली सिल्वर, स्टील और गोल्डन चेन वाली घड़ियों को कलाई पर बाधंने के लिये चयन करना ज्यादा लाभकारी माना जाता है।  

माना जाता है कि घड़ियां आपके जीवन के वक्त से सम्बंध रखती है यह आपके जीवन के अच्छे और बुरे वक्त को भी प्रदर्शित करती है इसलिये अपने करीबी रिश्तेदारों के अतिरिक्त अन्य किसी को उपहार के तौर पर घड़ी देने और लेने से बचना चाहिये।

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Preeti Rathore
Preeti Rathore
मैंने सी.एस.जे.एम. वि.वि. से MJMC, LLb, B.Ed, M.Sc (Zoology), M.A (Hindi, Economics, Political Science), "O" Level, CCC Computer Course एंव राजर्षि टण्डन वि.वि.से PGDMM की डिग्री प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त हिन्दुस्तान प्रेस, K.TV, में ट्रेनी पत्रकार एंव डिग्री कॉलेज और एनजीओ मे पत्रकारिता शिक्षक के रुप में कार्य किया है।

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