Rani Laxmibai Ji: November 2025: 1857 के झांसी विद्रोह को अपने हाथों में लेने वाली महान् वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी ने अपने नेतृत्व से ब्रिटिश शासन को लोहे के चने चबाने के लिये मजबूर कर दिया और मृत्यु के बाद भी खुद को अंग्रेजी सेना के हाथ न लगने दिया। चित्रा ने अर्जुन पाया, शिव को मिली भवानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी, रानी लक्ष्मीबाई के वीरगति को प्राप्त होने के बाद ब्रिटिश सेना का अधिकारी ह्यूमरोज ने कहा था कि अपनी दृढ़ता में अडिंग यह महिला विद्रोहियों के बीच एकमात्र मर्द थी। ऐसी वीरांगना झांसी की रानी कानपुर से 1857 के विद्रोह का नेतृत्व करने वाले नाना साहब की मुंह बोली बहन छबीली थी।

वराणसी में मोरोपन्त के घर में जन्मी थी, मणिकर्णिकाः
19 नवम्बर 1828 को वराणसी में पिता मोरोपन्त और माता भागीरथी सापारे के घर में जन्मी मणिकर्णिका अपने पिता की इकलौती सन्तान थी। जिन्हें बचपन से तलवार चलाने की महारत हासिल थी। कानपुर से 1857 के विद्रोह का नेतृत्व करने वाले नाना साहब की मुंह बोली बहन छबीली जो कि रानी लक्ष्मीबाई जी के बचपन का नाम था। वह नाना जी के साथ शास्त्रों के ज्ञान को ग्रहण करने के साथ अस्त्रों का ज्ञान बरछी, तलवार चलाना भी सीखती थी। मणिकर्णिका ताम्बें के पिता उन्हें मनु असल नाम से बुलाया करते थे।
मणिकर्णिका का नाम शादी के बाद पड़ गया, रानी लक्ष्मी बाईः
चौदह वर्ष की आयु 1842 में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ। शादी के बाद से उनका नाम रानी लक्ष्मी बाई पड़ गया। उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन जन्म के चार महीने बाद ही उनका वह पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गया। जिससे आह्त महाराजा गंगाधर राव दुखी रहने लगे और बीमारी के चलते 21 नवम्बर 1853 में गंगाधर राव की मृत्यु हो गई।
गंगाधर राव ने अपनी मृत्यु के पहले अपने रिश्तेदार के पुत्र दामोदर राव को गोद ले लिया था। गंगाधर की मृत्यु के बाद से ही डलहौजी अपनी साजिशों से झांसी पर हड़प नीति से कब्जा करने की तैयारी की इस नीति के तहत यदि भारतीय शासक का कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता था तो उसके राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था। डलहौजी ने इस बात का फायदा उठाते हुये रानी लक्ष्मी बाई जी के दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार किया और झांसी पर कब्जा करने के उद्देश्य से सेना को भेज दिया।

रानी लक्ष्मीबाई जी ने स्वयंसेवक सेना का किया गठनः
रानी लक्ष्मीबाई ने विलयनीति के खिलाफ आवाज उठायी और अपनी हमशक्ल झलकारी बाई को सेना का प्रमुख नियुक्त करके स्वयंसेवक सेना का गठन किया। जब ओरझा और दतिया के राजाओं ने झांसी पर हमला किया तब रानी लक्ष्मीबाई उनके सभी हमलों को विफल करने में सफल हुई। लेकिन ब्रिटनी सेना ने झांसी पर हमला बोल कर दो हफ्तों तक चले युद्ध के बाद पूरे शहर को अपने कब्जे में ले लिया तब उनकी हमशक्ल सेना प्रमुख झलकारी बाई सैनिको को चकमा देने के लिये रानी लक्ष्मी बाई बनकर उनके सामने पहुँच गई जिसके कारण रानी लक्ष्मी बाई जी को झांसी छोड़ कर ग्वालियर भागने में सफल हो गई।
यहाँ पर उन्होंने तात्याटोपे की मदद से ग्वालियर के किले पर कब्जा किया लेकिन ग्वालियर की अग्रेंजी सेना ने उन पर हमला बोल दिया और युद्ध भूमि में एक सैनिक ने उन पर गोली चला दी और दूसरे सैनिक ने उन पर तलवार से प्रहार किया जिससे उनके सिर पर भारी चोट आने से उनकों एक आँख से दिखना बंद हो गया। इसके बाद भी उन्होंने अपनी तलवार नहीं छोड़ी और अपने अद्धप्राणों की अवस्था में लड़ाई जारी रखी अतंतः झांसी की महान् वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हुई।
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