Mahashivratri 2026:जब भीतर का शोर शांत हो। अहंकार राख बन चुका हो। मन के असन्तुलित लास्य पर मनुष्य का तांडव संगत कर रहा हो, शिव कैलाश से उतर आते हैं.. हमारे भीतर..!
जब प्रेम का व्याकरण, करुणा के छंद, और संवेदना के ग्रन्थ की जरुरत हो, शिव पाणिनी के अष्टाध्यायी में माहेश्वर सूत्र बनकर प्रगट हो जातें हैं।
और जब किसी दिन किसी से प्रेम करना ध्यान बनने लगे…संभोग करना समाधि.. तब शिव विज्ञान भैरव तंत्र के एक सौ बारह सूत्र बनकर हमें सिखाते हैं कि भोग और योग में द्वैत नही है, जीव और शिव दो नही है। सब अद्वैत है..सब अद्वैत।

और एक दिन सांप-मोर, नन्दी, मूषक के साथ गृहस्थी बसाने वाले शिव वो गृहस्थ बनकर हमें बताते हैं कि ये जीवन सिर्फ और सिर्फ विसंगतियों से भरा है। यहाँ सब कुछ कभी पूर्ण और सुंदर नही हो सकता।
इन विसंगतियों में संतुलन बिठा लेना ही शिवमय हो जाना है।
दरअसल शिव कैलाश पर नही रहते, वो हमारे भीतर ही रहते हैं..योग और भोग, करुणा और क्रोध, लय और ताल, सांसारिकता और विरक्ति का अद्भुत संतुलन बनकर..!
आज उसी संतुलन की साधना ही शिव की साधना है।
आप सबको महाशिवरात्री की शुभकामना…!
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