HC: नयी दिल्ली में पटियाला हाउस कोर्ट के विद्वान न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (Ld. JMFC) श्री साहिल मोगा ने आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए खोजी पत्रकार संजय तिवारी को उन सभी फर्जी आपराधिक मामलों से बरी कर दिया है, जो करीब 19 साल पहले उनके खिलाफ साजिश के तहत दर्ज किए गए थे। उल्लेखनीय है कि इसी मामले से जुड़ी एक अन्य एफआईआर को माननीय दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले ही रद्द (Quash) कर पत्रकार के पक्ष में कड़ा फैसला सुनाया।
संजय तिवारी ने आदिवासी कल्याण फंड घोटाले का किया था पर्दाफाश
यह पूरा मामला साल 2007 के उस साहसी स्टिंग ऑपरेशन से जुड़ा है, जिसमें संजय तिवारी ने तत्कालीन केंद्र सरकार के दौरान गरीब आदिवासियों के लिए आने वाले ‘ट्राइबल फंड’ में मंत्रियों और सांसदों द्वारा की जा रही भारी धांधली का खुलासा किया था। इस खुलासे से तिलमिलाए नेताओं ने अपनी सत्ता और पावर का गलत इस्तेमाल कर संजय तिवारी के खिलाफ फर्जी मुकदमों की झड़ी लगा दी थी।
बड़े मीडिया हाउसों और ‘आज तक’ जैसे चैनलों की संदिग्ध भूमिका
संजय तिवारी ने मीडिया जगत के एक भयावह सच को उजागर करते हुए बताया कि उन्होंने इस स्टिंग ऑपरेशन का टेप उस समय ‘आज तक’ चैनल के मालिक अरुण पुरी, इंडिया टीवी, एबीपी न्यूज़ और एनडीटीवी जैसे बड़े संस्थानों को सौंपा था। लेकिन न्याय के लिए इसे चलाने के बजाय, इन मीडिया घरानों ने कथित तौर पर इस टेप को आरोपी नेताओं को दिखाकर उनसे सौदेबाजी की और अपना ‘उल्लू सीधा’ किया।
इतना ही नहीं, जब सरकार के इशारे पर संजय तिवारी के खिलाफ फर्जी केस दर्ज किए गए, तब इन्हीं प्रमुख चैनलों ने सच्चाई दिखाने के बजाय पत्रकार को ही ‘विलेन’ बनाकर पेश किया। पत्रकार को समाज में बदनाम करने और घोटाले से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इन चैनलों ने जमकर ‘प्लांटेड न्यूज’ चलाई और उनकी छवि को भारी नुकसान पहुँचाया।
सरकारी गवाह और आईएएस अधिकारी का झूठ
मामले को संगीन बनाने के लिए पुलिस ने भारत सरकार के एक सीनियर आईएएस (IAS) अधिकारी को मुख्य सरकारी गवाह बनाया था। लेकिन अदालत की कार्यवाही के दौरान वह अधिकारी कोर्ट में होस्टाइल (Hostile) हो गए और उनका झूठ टिक नहीं सका। इससे यह साबित हो गया कि पत्रकार को कुचलने के लिए सत्ता, प्रशासन और बिकाऊ मीडिया का एक खतरनाक गठजोड़ काम कर रहा था।
शिकायतकर्ता और मामलों का विवरण
FIR 180/2007: सांसद सुशीला केरकेट्टा द्वारा।
FIR 181/2007: तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रामेश्वर उरांव द्वारा।
FIR 182/2007: सांसद टेकलाल महतो द्वारा।
FIR 163/2012: केंद्रीय मंत्री पवन सिंह घटोवार द्वारा (दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे रद्द किया)।
सत्य और साहस की जीत
ट्रायल कोर्ट पटिआला हॉउस के जज श्री साहिल मोगा और दिल्ली हाईकोर्ट के जज श्री अरुण मोगा ने पूरे मामले को झूठा करार देते हुए संजय तिवारी को न्याय दिया। यह फैसला उन शक्तिशाली राजनेताओं और बिकाऊ मीडिया घरानों के चेहरे पर तमाचा है जिन्होंने एक पत्रकार की आवाज को दबाने के लिए चरित्र हनन का सहारा लिया था।
देखिये उस वक़्त NDTV Zee News सारी बड़ी मीडिया कैसे बिक गयी थी….
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