Bhagavad Gita Jayanti: December2025: जब जब धर्म की हानि होती है, अधर्म की वृद्धि होती है। तब तब मैं स्वंय प्रकट होता हूँ। यदा यदा धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मान सृजाम्हम्।। हिन्दू कैलेडंर के अनुसार अगहन महीने में शुक्ल पक्ष के 11 वें दिन शुक्ल एकादशी के दिन श्रीमद्भगवद् गीता जयंती मनायी जाती है। मान्यता है कि इस दिन कुरुक्षेत्र मैदान में जगत विधाता श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।
सत्य और न्याय का युद्ध था, महाभारत:
सिहासंन के लिये 18 दिनों का 100 कौरवों और पाँच पाण्डंवों के बीच चलने वाला यह युद्ध वैदिक साहित्य के अनुसार सबसे बड़ा युद्ध था। और वैदिक सभ्यता का इस भीषण युद्ध में अंत हो गया। इसका वर्णन महर्षि वेदव्यास ने अपने महाकाव्य महाभारत में किया है। सत्य और न्याय के लिये लड़े गये इस युद्ध को महाभारत महाकाव्य में धर्म युद्ध बताया गया है।

श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को दिखाया अपना विराट रुपः
पाण्डंवों द्वारा 12 वर्ष के ज्ञातवास और एक वर्ष के अज्ञात वास की शर्ते पूरी लेने के बाद जब कौरवों ने पाण्डंवों को राज्य देने से माना कर दिया था। तब पाण्डवों ने युद्ध करने का निश्चय किया। लेकिन श्रीकृष्ण ने युद्ध में होने वाली संपूर्ण विश्व की भारी क्षति का आभास कर लिया था। जिसके कारण दुर्योधन को अन्तिम अवसर देने के उद्देश्य से कुरु राज्य सभा में शांतिदूत बनकर पहुँचें और दुर्योधन से पाण्डवों के लिये पाँच गांव मांगे थे। जिसको सुनते ही अहंकारी दुर्योधन ने श्रीकृष्ण से कहा कि पाँच गांव तो क्या सुई की नोकं के बराबर जमीन नहीं मिलेगी इतना कहकर श्रीकृष्ण को बधंक बनाने का दुस्साहस किया। जिसके बाद श्रीकृष्ण ने अपना विराट रुप दिखाकर कुरु सभा से चले गये। तब युधिष्ठर को युद्ध करने के लिये विवश होना पड़ा था।

महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र को दी थी, महाभारत युद्ध को देखने के लिये दिव्य दृष्टिः
महाभारत युद्ध की भयावह स्थिति को बनते देख महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र से कहा कि तुम्हारे पुत्रों ने गुरुजनों की अवहेलना कर घोर पाप किया जिसका परिणाम विनाशकारी युद्ध के रुप में दिखाई दे रहा है। महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध को देखने के लिये दिव्य दृष्टि प्रदान की जैसे ही धृतराष्ट्र ने महाभारत के युद्ध को उस दिव्य दृष्टि से देखा और अपने कुल का विनाश देखकर वह कांप उठे । धृतराष्ट्र ने महर्षि वेदव्यास से कहा कि मैं इस युद्ध को अपनी आँखों से नही देख सकता हूँ। तभी महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्य संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की जिसके बाद संजय ने कुरुक्षेत्र के मैदान में चल रहे महाभारत युद्ध का वृतांत धृतराष्ट्र को सुनाया था।

महाभारत काल में कुरुराज्य था, सबसे बड़ा जनपदः
महाभारत युद्ध में सभी जनपद कौरवों के पक्ष में थे। लेकिन कुरुराज्य सबसे बड़ा जनपद श्रीकृष्ण के पक्ष में था। म युद्ध में श्रीकृष्ण ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली और कहा मैं अकेला और मेरी अक्षौहणी नरायणी सेना तभी अर्जुन ने श्रीकृष्ण का साथ चुना लेकिन जब अर्जुन ने अपने विपक्ष में अपने गुरु द्रोण, भीष्म पितामाह और सगे सबंधियों को देखा तो वह युद्ध से पीछे हटने लगे और कहा कि जिनके लिये हम राजभोग प्राप्त करना चाहते है वह सभी मेरे विरुद्ध में खड़े हुये है।
श्रीकृष्ण ने कहा, तुम धर्म के लिये लड़ो अर्जुन:
तभी श्रीमद्भगवद् गीता के उपदेश को देते हुये श्रीकृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन शरीर नश्वर है, आत्मा कभी नही मरती ये सब प्रकृति तुमसे करवा रही है। तुम धर्म के लिये लड़ो अर्जुन श्रीकृष्ण का उपदेश ग्रहण कर युद्ध के लिये आगे बढ़ते है। महाभारत के प्रथम दिन के युद्ध में पाण्डवों में विराटनरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत वीरगति को प्राप्त हो गये और युद्ध के अंत में कौरवों की हार और पाण्डवों की जीत हुई। द्वारका नगरी समुद्र में समा गई इस तरह वैदिक सभ्यता का अंत हो गया। श्रीमद्भगवद् गीता में वर्णित ज्ञान योग से भक्ति की प्रेरणा मिलती है जबकि कर्मयोग निष्काम भाव से कर्म करने की शिक्षा देता है।
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